Namaz e Ayaatनमाज़ आयात से मुताल्लिक कुछ अहकाम अयातुल्ला सय्यिद अली सिस्तानी की तौज़ेयूल मसाएल से
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मसला न: १५००

नमाज़ आयात जिस के पढने का तरीका बाद में बयान होगा तीन चीज़ों की वजह से वाजिब होती है :
१. सूरज गिर्हन
२. चाँद गिर्हन , अगरचे इस के कुछ हिस्से को ही गिर्हन लगे और ख्वाह इंसान पर इस की वजह से खौफ भी तारी न हुआ हो
३. ज़ल्ज़लाह , अहतियात वाजिब की बिना पर , अगरचे इस से कोई भी खौफ्ज़दा न हुआ हो

अलबत्ता बादलों की गरज , बिजली की कड़क , सुर्ख व स्याह आंधी और इन्ही जैसी दूसरी आसमानी निशानियाँ जिन से अक्सर लोग खौफज़दा हो जाएँ और इसी तरह ज़मीन के हादसात मसलन (दरया और ) समुन्दर के पानी का सूख जाना और पहाड़ों का गिरना जिन से अक्सर लोग खौफज़दा हो जाते हैं उन सूरतों में भी इह्तियात मुस्तहब की बिना पर नमाज़ आयात तर्क नहीं करना चाहिए

मसला न: १५०१
जिन चीज़ों के लिए नमाज़ आयात पढना वाजिब है के अगर वोह एक से ज़यादा व कूह्पजीर हो जाएँ तो ज़रूरी है के इंसान उन में से हर एक के लिए एक नमाज़ आयात पढ़े मसलन अगर सूरज को भी गिर्हन लग जाये और ज़ल्ज़लाह भी आजाये तो दोनों के लिए दो अलग अलग नमाजें पढनी ज़रूरी है

मसला न: १५०२
अगर किसी शख्स पर कई नमाज़ आयात वाजिब हों खावाह वोह सब उस पर एक ही चीज़ की वजह से वाजिब हुई हों मसलन सूरज को तीन दफा गिर्हन लगा हो और उस ने उस की नमाजें न पढ़ी हों या मुख्तलिफ चीज़ों की वजह से मसलन सूरज गिर्हन और चाँद गिर्हन और ज़ल्ज़लाहे की वजह से उस पर वाजिब हुई हों तो उन की क़ज़ा करते वक़्त यह ज़रूरी नहीं के वोह इस बात का तय्युन करे के कौन सी कज़ा कौन से चीज़ के लिए कर रहा है

मसला न: १५०३
जिन चीज़ों के लिए आयात पढना वाजिब है वोह जिस शहर में व कूपजीर हों फ़क़त उसी शहर के लोगों के लिए ज़रूरी है के नमाज़ आयात पढ़ें और दुसरे मकामत के लोगों के लिए उस का पढना वाजिब नहीं है

मसला न: १५०४
जब सूरज या चाँद को गिर्हन लगने लगे तो नमाज़ आयात का वक़्त शुरू हो जाता है और उस वक़्त तक रहता है जब तक वोह अपनी साबका हालत पर लौट न आयें , अगरचे बेहतर यह है की इतनी ताखीर न करे के गिर्हन ख़तम होने लगे , लेकिन नमाज़ आयात की तकमील सूरज या चाँद गिर्हन ख़तम होने के बाद भी कर सकते हैं

मसला न: १५०५
अगर कोई शख्स नमाज़ आयात पढने में इतनी ताखीर करे के चाँद या सूरज , गिर्हन से निकलना शुरू हो जाये तो अदा की नियत करने में कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर उस के मुकम्मल तौर पर गिर्हन से निकल जाने के बाद नमाज़ पढ़े तो फिर ज़रूरी है के क़ज़ा की नियत करे

मसला न: १५०६
अगर चाँद या सूरज को गिर्हन लगने की मुद्दत एक रकत नमाज़ पढने के बराबर या उस से भी कम हो तो जो नमाज़ वोह पढ़ रहा है अदा है और येही हुकुम है अगर उन के गिर्हन की मुद्दत उस से ज़यादा हो लेकिन इंसान नमाज़ न पढ़े यहाँ तक के गिर्हन ख़तम होने में एक रकत पढने के बराबर या उस से कम वक़्त बाकी हो

मसला न: १५०७
जब कभी ज़ल्ज़लाह , बादलों की गरज , बिजली की कड़क , और उस जैसी चीज़ें व कूह्पजीर हों तो अगर उन का वक़्त व सहीह हो तो नमाज़ आयात को फ़ौरन पढना ज़रूरी नहीं है बसूरत दीगर ज़रूरी है के फ़ौरन नमाज़ आयात पढ़े यानि इतनी जल्दी पढ़े के लोगों की नज़रों में ताखीर करना शुमार न हो और अगर ताखीर करे तो अहतियात मुस्तहब यह है के बाद में अदा  और क़ज़ा की नियत किये बगैर पढ़े

मसला न: १५०८
अगर किसी शख्स को चाँद या सूरज को गिर्हन लगने का पता न चले और उन के गिर्हन से बहार आने के बाद पता चले के पूरे सूरज या पूरे चाँद को गिर्हन लगा था तो ज़रूरी है के नमाज़ आयात की क़ज़ा करे लेकिन अगर उसे यह पता चले के कुछ हिस्से को गिर्हन लगा था तो ज़रूरी है के नमाज़ आयात की क़ज़ा करे लेकिन अगर उसे यह पता चले के कुछ हिस्से को गिर्हन लगा था तो नमाज़ आयात की क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं है

मसला न: १५०९
अगर कुछ लोग यह कहें के चाँद को या यह के सूरज को गिर्हन लगा है और इंसान को ज़ाती तौर पर उन के कहने से यकीन या इत्मीनान हासिल न हो इस लिए वोह नमाज़ आयात न पढ़े और बाद में पता चले के उन्होंने ठीक कहा था तो उस सूरत में जब के पूरे चाँद को या पूरे सूरज को गिर्हन लगा हो नमाज़ आयात पढ़े लेकिन अगर कुछ हिस्से को गिर्हन लगा हो तो नमाज़ आयात का पढना उस पर वाजिब नहीं है , और येही हुकुम उस सूरत में है जब के दो आदमी जिन के आदिल होने के बारे में इल्म न हो यह कहें के चाँद को या सूरज को गिर्हन लगा है और बाद में मालूम हो के वोह आदिल थे

मसला न: १५१०
अगर इंसान को माहेरीन फिल्कियात के कहने पर जो इल्मी काइदे की रूसे सूरज को और चाँद को गिर्हन लगने का वक़्त जानते हों इत्मीनान हो जाये के सूरज को या चाँद को गिर्हन लगा है तो ज़रूरी है के नमाज़ आयात पढ़े और इसी तरह अगर वोह कहें के सूरज या चाँद को फलाह वक़्त गिर्हन लगेगा और इतनी देर तक रहेगा और इंसान को उन के कहने से इत्मीनान हासिल हो जाये तो उनके कहने पर अमल करना ज़रूरी है

मसला न: १५११
अगर किसी शख्स को इल्म हो जाये के जो नमाज़ आयात उस ने पढ़ी है वोह बातिल थी तो ज़रूरी है के दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र गया हो तो उस की क़ज़ा बजा लाये

मसला न: १५१२
अगर यौमिया नमाज़ के वक़्त नमाज़ आयात भी इंसान पर वाजिब हो जाये और इस के पास दोनों के लिए वक़्त हो तो जो भी पहले पढ़ ले कोई हर्ज नहीं है और अगर दोनों में से किसी एक का वक़्त तंग हो तो पहले वोह नमाज़ पढ़े जिस का वक़्त तंग हो और अगर दोनों का वक़्त तंग हो तो ज़रूरी है के पहले यौमिया नमाज़ पढ़े

मसला न: १५१३
अगर किसी शख्स को यौमिया नमाज़ पढ़ते हुए इल्म हो जाये के नमाज़ आयात का वक़्त तंग है और यौमिया नमाज़ का वक़्त भी तंग हो तो ज़रूरी है के पहले यौमिया नमाज़ को तमाम करे और बाद में नमाज़ आयात पढ़े और अगर यौमिया नमाज़ का वक़्त तंग न हो तो उसे तोडदे और पहले नमाज़ आयात और उस के बाद यौमिया नमाज़ बजा लाये

मसला न: १५१४
अगर किसी शख्स को नमाज़ आयात पढ़ते हुए इल्म हो जाये के यौमिया नमाज़ का वक़्त तंग है तो ज़रूरी है के नमाज़ आयात को छोड़ दे और यौमिया नमाज़ पढने में मशगूल हो जाये और यौमिया नमाज़ को तमाम करने के बाद उस से पहले के कोई ऐसा काम करे जो नमाज़ को बातिल करता हो बाक़ी मांदा नमाज़ आयात वहीं से पढ़े जहाँ से छोड़ी थी

मसला न: १५१५
जब औरत हैज़ या निफास की हालत में हो और सूरज या चाँद को गिर्हन लग जाये या ज़ल्ज़लाह आजाये तो उस पर नमाज़ आयात वाजिब नहीं है और न ही उसकी कज़ा है

Source : http://www.sistani.org/urdu/book/61/3641/
Ayatollah Sayyid Ali Sistani – Tauzeeul Masael (Urdu)